Wednesday, 4 March 2020

रिवालसर -हिमाचल प्रदेश


रिवालसर का  पुरातन नाम "नील हृदयाचलसर" था । स्कन्द पुराण में लोमश ऋषि की तपोस्थली का नाम "रेवासर" कहा गया है। रिवालसर सम्भवत: " रेवासर " का अपभ्रंश शब्द हैं। मनी’ घुमाते मंत्र पढ़ते तिब्बती श्रद्धालु  सलेटनुमा पत्थरों पर मंत्र  उकेरते तिब्बती कलाकार हवा मैं उड़ते, मंत्रो से सजे झंडे ,चील के पत्तो से जगह जगह जलाये हुए पवित्र अग्नि कुंड -अलौकिक दुनिया की सैर पर जाने से कम नहीं    
हिमाचल प्रदेश के त्रिवेणी संगम नाम से प्रसिद्द यह स्थान हिन्दू धर्म एवं सिक्खो का भी तीर्थ सथल है - -बौद्ध गुरु रिम्पोछे पद्मसंभव की तपोस्थली , सिक्खो के दसवें गुरु श्री गोबिंद सिंह जी ने यहाँ अपने जीवन काल का कुछ हिस्सा यहाँ पर बिताया है


 मंडी के राजा जोगिन्दर सैन ने यह गुरुद्वारा 1930  मैं बनवाया था - श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवन का कुछ समय यहाँ गुजारा था

                                                                 पवित्र झील 
घने वृक्षों तथा ऊँचे पहाड़ों से घिरी रिवालसर झील प्राकृतिक सौंदर्य के आकर्षण का केंद्र है। रिवालसर झील पर अकसर मिट्टी के टीले तैरते हुए देखे जा सकते हैं टीलों का चलना दैविक चमत्कार माना जाता है मान्यता है टीलों में गुरु पद्मसंभाव की आत्मा का निवास है रिवालसर झील के किनारे तीन बौद्ध मठ मोनास्टि्रयां हैं  झील में बहुत अधिक संख्या में मछलियाँ है। इनका शिकार वर्जित है। यहाँ झील से साथ ही एक छोटा सा चिड़ियाघर भी है

पहाड़ी पर स्तिथ मूर्ति इस तरह से लगाई गई है की सूर्य की पहली किरण सीधे मूर्ति पर पड़ती है 



मठ सो पेमा

एक मान्यता अनुसार गुरु पद्मसंभव यहाँ से बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए तिब्बत गये थे




लोमाश ऋषि का मंदिर 



यहाँ के मंदिर की एक अलग खासियत यह है की यहाँ नंदी जी की मूर्ति उलटी लगी है - जो भगवन को न देख कर झील की तरफ देख रही है


शिव मंदिर 

महर्षि लोमेश का मंदिर -साथ में नागर शैली में निर्मित एक शिवालय भी है।






रिवालसर में छेश्चु मेले में छम नृत्य करते हुए ।

रिवालसर मैं तीन दिवसीय राज्यस्तरीय छेश्चू मेले के प्रथम दिनआकर्षण बौद्ध गोम्पा में छम्ब नृत्य देखने का मौका मिला - -छम्ब नृत्य धार्मिक नृत्य है लामा इसे केवल बौद्ध मंदिरो मैं ही करते है






कुंती झील जो 8 किलोमीटर दूर है



नैना देवी मंदिर 11 किलोमीटर दूर है  






गुफा जहां लोमाश ऋषि ने पूजा की थी -9 किलोमीटर दूर 



कुंती मंदिर 


जब नैना देवी के मंदिर को जाते है तो रस्ते मैं आता है कुंती सर -दन्त कथा अनुसार महाभारत काल मैं पांडव यहाँ से गुजरे तो कुंती को प्यास लगी आस पास पानी था नहीं तो अर्जुन ने तीर चला कर इस झील का निर्माण किया यहाँ पर एक छोटा सा मंदिर भी है


                                       मोनेस्ट्री के अन्दर बना हनुमान जी का मंदिर

दार्जिलिंग

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