Sunday, 30 August 2026

मुक्तिनाथ मंदिर-Nepal

 


हिंदू
और बौद्ध  धर्म के अनुयाइयो के लिए मुक्तिनाथ मंदिर हिमालय के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है, मुक्तिनाथ धाम, जिसेमोक्ष का स्थानमाना जाता है, मुक्तिनाथ मंदिर हिंदू धर्म के 108 दिव्य देशमों में से एक है और इसे भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर में पूजा करने से भक्तों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है, इसलिए इसेमुक्तिनाथकहा जाता है,यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय मार्च से जून और सितंबर से नवंबर के बीच होता है। आप सड़क से यां पोखरा से आप जोमसोम तक की हवाई यात्रा कर सकते हैं यात्रा की शुरुआत पोखरा की हरी-भरी घाटियों से होती है। आगे बढ़ने पर यह मार्ग मरुस्थलीय और पहाड़ी रेगिस्तान (Mustang region) में बदल जाता है।



मुक्तिनाथ नेपाल के मुस्तांग जिले में लगभग 3,710 से 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।यहाँ जाने के लिए आपको परमिट लेना पड़ता है जो आपको पोखरा से लेना पड़ता है फेवा लेक किनारे ऑफिस से आप परमिट ले सकते है इसके लिए आपको दो फोटो तथा वोटर कार्ड की जरूरत है आप पोखरा से टैक्सी ले कर जा सकते है आप परमिट के लिए ऑनलाइन भी apply कर सकते है -ड्राइवर एक्स्ट्रा पेमेंट  ले कर परमिट का प्रबंध कर देते है



सड़क मार्ग से दूरी 180  किमी के बीच है, सबसे पहले आता है  बेनी,फिर  तातोपानी और जोमसोम होते हुए मुक्तिनाथ पहुँचते है  पूरी यात्रा को तीन चरणों मे बाँट सकते है



पोखरा से बेनी (लगभग 100-110 किमी): यह पहला चरण यात्रा का सबसे आसान हिस्सा है, यहाँ तक  पक्की  सड़क  है।



बेनी से जोमसोम (लगभग 65-70 किमी): यहीं से यात्रा वास्तव में रोमांचक हो जाती है। यह सड़क काली गंडकी घाटी से होकर तातोपानी, घासा, कालोपानी और मारफा से गुजरती है और ज्यादातर कच्ची, ऊबड़-खाबड़ है, और मौसम के अनुसार भूस्खलन या कीचड़ भरे रास्तों का खतरा बना रहता है।


जोमसोम से मुक्तिनाथ (लगभग 19-21 किमी)

 घासा: पोखरा/बेनी से लोअर मुस्तांग क्षेत्र में सड़क मार्ग से गाड़ी या सवारी करके आने वाले यात्रियों के लिए पहला एंट्री चेक पोस्ट। घासा से जोमसोम तक सड़क मार्ग से लगभग 34 किलोमीटर की दूरी तय होती है। आप घासा (6,594 फीट) से जोमसोम (8,860 फीट) तक चढ़ते हैं।



 जोमसोम नेपाल में अन्नपूर्णा सर्किट ट्रेक पर एक ट्रेकिंग पर्वतीय शहर है। लोग यहीं से ट्रैकिंग शुरू करते हैं। आप यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा शालिग्राम देख सकते हैं


श्री विष्णु शालिग्राम शिला के रूप में हैं। दुनिया को बुरी ताकतों से बचाने की प्रक्रिया में, श्री विष्णु ने चाहते हुए भी अपनी प्रिय भक्त तुलसी को धोखा दिया। इसके परिणामस्वरूप, उन्हें शालिग्राम शिला के रूप में जीवन बिताने का श्राप मिला।

लेकिन वर्तमान मंदिर, पैगोडा शैली में निर्मित, 1815 ईस्वी के आसपास राजा राणा बहादुर शाह की पत्नी और राजा पृथ्वी नारायण शाह की बहू रानी सुवर्ण प्रभा देवी द्वारा बनाया गया था।

गंडकी नदी का पानी 108 गाय के सिर वाली पानी की टोंटियों से होकर बहता है, जिन्हें 108 मुक्ति धारा के नाम से जाना जाता है। हिंदुओं का मानना ​​है कि इन 108 मुक्ति धाराओं में नहाने से पिछले पाप और बुरे कर्म धुल जाते हैं।


गुरु रिनपोछे और स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों के लिए, मुक्तिनाथ को बहुत शक्तिशाली मानते हैं









कुशीनगर

 


लुम्बिनी नेपाल से हम जायेगे कुशीनगर वाया गोरखपुर

लुम्बनी से गोरखपुर लगभग 115 से 130 किलोमीटर है टैक्सी से 3 hrs



लुम्बिनी -से भैरहवा पहुंचा जाता है।इंडियन साइड  बॉर्डर को सोनौली बॉर्डर कहते है यहां से  गोरखपुर होते हुए 55km kusinagar  1 hrs.यहाँ पहुँचने के लिए सड़क, रेल और हवाई मार्ग जैसे विभिन्न परिवहन साधन उपलब्ध हैं।

लुम्बनी मे बुध का जनम सथल है तो कुशीनगर मे यह वह स्थान है जहाँ उन्हें मृत्यु और मोक्ष प्राप्त हुआ था। लगभग 483 ईसा पूर्व 80 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध ने कुशीनगर में ही शरीर त्याग किया था


यहां कई सुंदर पर्यटक आकर्षण हैं जैसे मथाकौट मंदिर, जापानी मंदिर, वाट थाई मंदिर, चीनी मंदिर, रामाभर स्तूप, बिरला मंदिर, सूर्य मंदिर,


 रामभर स्तूप - भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार यहीं किया गया था।




परिनिर्वाण स्तूप -बौद्ध धर्म के अनुसार, बुद्ध के दाह संस्कार के अवशेष इसी स्तूप में रखे गए हैं।   यहां भगवान बुद्ध की 20 फीट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा  मिली थी।

जहाँ उनका जन्म हुआ था (लुम्बिनी) , जहाँ उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ (बोधगया) , जहाँ उन्होंने सर्वप्रथम उपदेश दिया (सारनाथ ) , और जहाँ उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया (कुशीनगर )







मुक्तिनाथ मंदिर-Nepal

  हिंदू और बौद्ध   धर्म के अनुयाइयो के लिए मुक्तिनाथ मंदिर हिमालय के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है , मुक्तिनाथ धा...