जयपुर --मध्ययुगीन भारत का पहला योजनाबद्ध शहर है यह पिंक सिटी के नाम से भी प्रसीद है पुराने शहर में तीन मुख्य आकर्षण हैं। हवा महल ,सिटी पैलेस और जंतर मंतर
सिटी पैलेस को विद्याधर भट्टाचार्य और सर सैमुअल स्विंटन जैकब ने डिजाइन किया था इसका निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था पैलेस में किसी भी प्रवेश द्वार के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। त्रिपोलिया गेट (Tripolia Gate) शाही परिवार (Royal Family) के लिए आरक्षित है
सिटी पैलेस के जो आलीशान दरवाजों, खिड़कियों और भित्तिचित्रों से सजाया गया है तथा
अतीत की यादों को समेटे शान से खड़ा है।
जयपुर की स्थापना सन् 1727 आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने की थी। यह भारत
के सबसे पहले योजनाबद्ध (planned) शहरों में से एक है, जिसे विद्याधर भट्टाचार्य ने वास्तु
शास्त्र के अनुसार डिज़ाइन किया था।
1876 में प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत में महाराजा राम सिंह ने पूरे शहर को गुलाबी रंग
(टेराकोटा पिंक) से रंगवा दिया था। 2019 में, पूरे जयपुर शहर को यूनेस्को (UNESCO)
द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया गया।
मुबारक महल में अब महाराजा सवाई मानसिंह
द्वितीय संग्रहालय बना दिया गया है,
जिसमें शाही पोशाकें, अद्भुत पश्मीना शॉल, बनारसी साड़ियाँ, रेशमी वस्त्र, जयपुर के
सांगानेर प्रिंटेड कपड़े और अन्य बहुमूल्य रत्न जड़ित कपड़े रखे हुए हैं।
महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम तथा महारानियों के वस्त्रों का संग्रह भी यहाँ देख सकते
हैं। महारानी पैलेस में सुसज्जित अस्त्र शस्त्र, कवच, ज़िरह-बख्तर आदि रखे हैं। महल की
छत सुन्दर पेन्टिंग से सजाई गई है।
गणेश पोल: यह एक खूबसूरत दरवाजा
है, जिस पर सुंदर फ्रेस्को पेंटिंग बनी हैं और यह निजी प्रवेश द्वार था।
दीवान-ए-खास
(Hall of Private Audience): जिसमें इटालियन मार्बल के खंभे और शीशे लगे हैं।
सुख निवास (Pleasure Palace): यह गर्मियों के लिए था, जहाँ ठंडी हवा के लिए मार्बल का झरना बना है।
शिला देवी मंदिर: पास ही स्थित यह मंदिर भी दर्शनीय है।
जलेब
चौक: यह पहला आंगन है जहाँ सैनिकों की परेड होती थी।
जल महल एक पांच मंजिला, लाल बलुआ पत्थर से र्निर्मित महल है, पांच मंजिलों में एक चार मंजिलें पानी में डूबी हुई है और आप केवल इसकी पांचवी मंजिल ही देख सकते हैं। महल की छत पर एक बगीचा है जिसे चमेली बाग कहते हैं इस महल में पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है
महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा 18वीं सदी में बनवाया गया, ’रोमांटिक महल’ के नाम से भी जाना जाता है। राजा अपनी रानी के साथ इस महल में खास वक्त बिताने आते थे
जयपुर के संस्थापक महाराजा
सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई पाँच खगोलीय वेधशालाओं में सबसे विशाल है, जयपुर
की यह वेधशाला। इसे जंतर मंतर कहते हैं। यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर सूची में
शामिल किया गया है। इसमें बनाए गए जटिल यंत्र, समय को मापने, सूर्य की गति के सम्बन्ध
में विस्तारपूर्वक जानकारी देते हैं।
अल्बर्ट हॉल वास्तुकला की इंडो सार्केन शैली को
प्रदर्शित करता है राम निवास गार्डन के पास है -यहाँ आप लाखों साल पुरानी मम्मी को
देख सकते है
जोहरी
बाजार का लक्ष्मी मिष्ठान भंडार नाश्ते के लिए ,टोंक रोड पर टाइगर ट्रेल राजस्थान
के मांसाहारी खाने के लिए ,जोहरी बाज़ार शॉपिंग के लिए प्रसिद्द
है
भारत के किले इतिहास की वीरता, अनूठी वास्तुकला और शाही विरासत
के प्रतीक हैं। जो भारतीय संस्कृति और वास्तुकला का अद्भुत संगम पेश करते हैं।
जयपुर की शान… इतिहास की पहचान -आमेर
किला राजपूताना शौर्य और मुगल-राजपूत वास्तुकला का एक भव्य प्रतीक है।
जयपुर के केंद्र से मात्र 11 किलोमीटर
दूर स्थित आमेर किला कभी आमेर के शासकों का प्रिय निवास स्थान था, लेकिन आज यह यूनेस्को
विश्व धरोहर स्थल ,एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।
माओटा झील के किनारे पीले-गुलाबी बलुआ
पत्थर से बना है यह किला राजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित और बाद में सवाई जयसिंह
द्वारा विकसित
किले की ऊँची इमारत तक पहुँचने
के लिए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, लेकिन आप हाथी की सवारी करके शाही अंदाज में प्रवेश
कर सकते हैं। यदि आप अधिक पारंपरिक राजस्थानी अनुभव चाहते हैं, तो ऊँट की सवारी का
आनंद लें।
चाहे आप इसके पूर्व निवासियों के रहस्यों
को जानना चाहते हों या बस आसपास के मनमोहक दृश्यों में खो जाना चाहते हों, आमेर किला,
जिसे प्यार से 'अंबर पैलेस' भी कहा जाता है, अपनी राजसी भव्यता को उजागर करने के लिए
आपका स्वागत करता है।
सूरज पोल से गुजरते ही आपकी
जिज्ञासा और बढ़ जाती है, जो कि एक भव्य मुख्य द्वार है और जलेब चौक की ओर जाता है,
जो कभी सेना का परेड मैदान हुआ करता था। यह वही स्थान है जहाँ सैनिक अपनी विजयों का
प्रदर्शन जनता के सामने करते थे।
चांद पोल दरवाजा, पहले आम
लोगों के प्रवेश के लिए था। इस आर्कषक पोल के सबसे ऊपरी मंजिल में
नौबतखाना बना था, जिसमें ढोल, नगाड़े एवं तबला समेत कई संगीत एवं वाद्य यंत्र बजाए
जाते थे।
जलेब चौक से दो तरफ सीढ़ियां दिखाई देती हैं, जिनमें से एक तरफ
की सीढि़यां राजपूत राजाओं की कुल देवी शिला माता मंदिर की तरफ जाती हैं। वहीं
दूसरी तरफ की सीढ़ियां सिंहपोल द्धवार की तरफ जाती हैं।
इस विशाल दुर्ग के बने 7 बेहद
आर्कषक औऱ सुंदर द्धारों में से एक है।
आपका अगला पड़ाव दीवान -ए-आम होगा, जो जनता के लिए समर्पित एक हॉल है,
जहाँ शासक अपने नागरिकों से आमने-सामने मिलते थे और उनकी चिंताओं और आकांक्षाओं को
ध्यान से सुनते थे।
मावठा झील में आमेर किले व
महल का प्रतिबिम्ब और इसके नीचे की तरफ बनी ’केसर क्यारी’ को देखकर पर्यटक आनन्दित
होते हैं।
दक्षिण की तरफ गणेश पोल द्धवार स्थित है, इस
द्दार के ऊपर भगवान गणेश जी की एक छोटी सी मूर्ति शोभायमान है, इसलिए आमेर किले के
इस द्धार को गणेश द्धार कहा जाता है।
सुख निवास, जिसे सुख महल भी
कहा जाता है, चंदन की लकड़ी के अपने सुंदर प्रवेश द्वार से आपका स्वागत करता है। महल
में जल-आपूर्ति वाली पाइपों के साथ एक आगे एक उल्लेखनीय वातानुकूलित वातावरण प्रदान
करती थी।
इस किले में जस मंदिर, ज़नाना (जहाँ महिलाएँ रहती
थीं), शाही उद्यान और मान सिंह का महल जैसे कई अन्य आकर्षण भी हैं।
लेकिन आमेर किले का असली रत्न
शीश महल है, जिसे दर्पणों का महल भी कहा जाता है। इस भव्य कक्ष में प्रवेश करते ही
आप दीवारों और छतों पर लगे हजारों छोटे-छोटे दर्पणों से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, जो
प्रकाश को ग्रहण करके उसे बहुरंगी रंगों में बदल देते हैं।
किले की विशाल दीवारों के
नीचे सुरंगों का एक जाल बिछा है, जो इसे विशाल जयगढ़ किले से जोड़ता है। इन सुरंगों
के कुछ हिस्सों को सावधानीपूर्वक पुनर्स्थापित किया गया है, जो अतीत की झलक पेश करते
हैं, जबकि अन्य अभी भी रहस्य में डूबे हुए हैं।
इस सबसे विशाल किले में रोजाना शाम को
लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया जाता है। शाम के प्रकाश और ध्वनि शो
के दौरान अंबर किले की सुंदरता सचमुच जीवंत हो उठती है। यह शो करीब 50 मिनट तक चलता
है।
जयगढ़ फोर्ट------
-सन् 1726 में, महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा यह किला आमेर की सुरक्षा के लिए बनवाया गया था। इसमें बने शस्त्रागार, अनूठा शस्त्र संग्रहालय, तोपें बनाने का कारखाना तथा विश्व की सबसे बड़ी तोप ‘जयवाण’ के कारण, राजस्थान में आने वाला प्रत्येक पर्यटक, जयपुर आकर इस तोप को जरूर देखना चाहता है। इस तोप को एक बार चलाया गया था जिससे शहर से 35 कि.मी. दूर एक तालाब का गड्ढा बन गया था। इसकी लम्बाई 31 फीट 3 इंच है तथा वजन 50 टन है। इसके 8 मीटर लंबे बैरल में 100 किलो गन पाउडर भरा जाता था।
नाहरगढ़ क़िला====सन् 1734 ई. में महाराजा
जयसिंह के शासनकाल के दौरान इस किले का निर्माण किया गया । नाहरगढ़ यानि शेर का किला।
इस किले में बनाए गए माधवेन्द्र भवन को ग्रीष्म काल में महाराजा के निवास के रूप में
काम में लिया जाता था। रानियों के लिए आरामदेय बैठक तथा राजा के कक्षों का समूह, आलीशान
दरवाजों, खिड़कियों और भित्तिचित्रों से सजाया गया, अभी हाल ही में महल में एक स्कल्पचर
आर्ट गैलरी भी बनवाई गई है।


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