Tuesday, 4 August 2026

गुहेश्वरी shaktipeeth -boudhnath stupa -nepal -kathmandu


SHAKTIPEETH KATHMANDU 


यहां गिरा था माता सती का घुटना


इस मंदिर को गुहेश्वरी और गुजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है।


अष्टमी तिथि पर यहां बलि दी जाती है। इस तिथि पर पूरी रात अनुष्ठान होते हैं।

 एकादशी पर बकरे और बत्तख की बलि दी जाती है।


यहां की पूजा में तांत्रिक मंत्रों का जप किया जाता है। ये मंत्र गुप्त रखे जाते हैं।


यहां देवी की पूजा पुजारी बाएं हाथ से करते हैं और अन्य देवताओं की पूजा दाएं हाथ से करते हैं।



स्वयंभू स्तूप


शाक्यमुनि बुद्ध की  बड़ी प्रतिमा एक ऊंचे चबूतरे पर स्थापित है। यह स्तूप नेपाल में अपनी तरह का सबसे पुराना स्तूप है और इसके परिसर में अनेक मंदिर और मठ स्थित हैं।



काठमांडू घाटी के सबसे बड़े स्तूप बोधा स्तूप की यात्रा करेंगे यह  टेम्पल  एक पहाड़ी पर स्तिथ है तक पहुँचने के लिए भक्तों को 365 पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।



स्वयंभू स्तूप अपने शांतिपूर्ण वातावरण,प्राथना चक्रो से बहती  आध्यात्मिक ऊर्जा ,रंग-बिरंगे झंडो ,चारों दिशाओं में भगवान बुद्ध की विशाल और रहस्यमयी आँखों के कारन अलग ही पहचान रखता है और यहां रहने वाले सैकड़ों बंदरों के कारण इसे  monkey टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है



स्वयंभू का अर्थ है 'स्वयं प्रकट हुआ'।  ऐसा कहा जाता है कि 2,5 00 वर्ष से भी अधिक समय पहले जब यह घाटी एक प्राचीन झील से बनी थी, तब यह स्तूप स्वतः ही अस्तित्व में आया था।  इस स्तूप  2,500 वर्ष से भी अधिक पुराना है




माना जाता है कि इसका निर्माण 460 ईस्वी में राजा मानदेव द्वारा करवाया गया था और 13वीं शताब्दी तक यह बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयंभू का जन्म एक कमल के फूल से हुआ था जो उस झील के बीचोंबीच खिला था जो कभी काठमांडू घाटी में फैली हुई थी।

 



मुख्य सफेद गुंबद के ऊपर एक चौकोर गुंबद है, जिस पर चारों दिशाओं में भगवान बुद्ध की विशाल और रहस्यमयी आंखें  बनी हुई हैं

पहाड़ी की चोटी के पीछे मंजुश्री या सरस्वती - विद्या की देवी - को समर्पित एक मंदिर है। स्तूप परिसर में बौद्ध और हिंदू देवी-देवताओं के चैत्य, मूर्तियां और मंदिर मौजूद हैं।



BOUD NATH STUPA 





Saturday, 1 August 2026

गुह्येश्वरी शक्तिपीठ -बूढ़ा नीलकंठ मंदिर -- Chandra giri Hills --Garden of dreams


नेपाल का बूढ़ा नीलकंठ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित  है,शेषनाग पर शयन मुद्रा में भगवान की 5 मीटर लंबी विशाल मूर्ति पानी में तैरती हुई प्रतीत होती है।जिसे एक ही चट्टान से तराशा गया है।भगवान विष्णु की मूर्ति नेपाल की सबसे बड़ी पत्थर की नक्काशी मानी जाती है,



swal yeh hai ki बूढ़ा नीलकंठ महादेव तो कहीं नहीं है.
ऐसी मान्यता है कि विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे गोंसाईकुंड झील का निर्माण हुआ
मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में उसी गोसाईन कुंड का जल आता है, जिसका निर्माण भगवान शिव ने किया था. इसलिए इसका नाम बूढ़ा नीलकंठ पड़ा.






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Baaleshwar temple 



Nepali dress of different community 



       


 

Garden of dreams 








नेपाल का गुह्येश्वरी शक्तिपीठ



नेपाल का गुह्येश्वरी शक्तिपीठअपने तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए भी जाना जाता है।



माता की महामाया और शिव के कपाली रूप की पूजा



पशुपतिनाथ से पहले मां के दर्शन की परंपरा



यहां सती के दोनों घुटने गिरे थे
खास बात है कि इस मंदिर में मां की कोई प्रतिमा नहीं है।यहाँ एक सोने या चांदी के कलश से ढका हुआ कुंड है,  



नवरात्र पर यहां पांच पशुओं की बली के साथ विशेष काल रात्रि पूजा होती है।


 मंदिर की वास्तुकला पैगोडा शैली में है। राजा प्रपात मल्ल द्वारा 1654 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था।


 

गुहेश्वरी shaktipeeth -boudhnath stupa -nepal -kathmandu

SHAKTIPEETH KATHMANDU  यहां गिरा था माता सती का घुटना इस मंदिर को गुहेश्वरी और गुजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। अष्टमी...