Friday, 10 June 2022

ओंकारेश्वर -

तन मन, स्पंदन सभी तेरे।

स्नेह-दीप प्रज्ज्वलित करूँ---तेरा तुझको ही समर्पित करूँ।''



नर्मदा नदी के किनारे, पवित्र ओम के आकार का  मंधाता द्वीप पर  शिव के 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक  ओंकारेश्वर  ज्योतिर्लिंग स्तिथ  है.


द्वीप को दो पुलों के माध्यम से जोड़ा गया है



नर्मदा नदी पर यह 270 फीट का लटकता कैंटिलीवर प्रकार का पुल है जो ओंकारेश्वर की सुंदरता को बढ़ाता है।

 मान्यता अनुसार  भगवान शिव और माता पार्वती प्रतिदिन तीनो लोकों में विचरण करते है और रात्री में विश्राम करने ओम्कारेश्वर आते है।


ओमकारेश्वर मंदिर यह पवित्र स्थान नर्मदा और कावेरी नदी के मिलन बिंदु पर स्थित है 



  घाट

 


आश्चर्यजनक सत्य ---

इस मंदिर की एक विशेष बात यहाँ पर होने वाली आश्चर्य चकित करने वाली घटना है - जो रोज होती है -  रोज रात को शयन आरती के बाद ज्योतिर्लिंग के सामने चौसर और पांसे सीधे जमाये जाते है। रात में गर्भ गृह में कोई प्रवेश नही कर सकता पर जब सुबह गर्भ गृह खुलता है तो पांसे उलटे पड़े मिलते है। यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक सत्य है। आस्था है कि महादेव और माता पार्वती रोज रात को पांसे से चौसर खेलते है।



ओंकारेश्वर नाम का अर्थ है ‘ओंकार के भगवान’


इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण की मूल तिथि कोई नहीं जानता। हालांकि, शुरुआती सबूत बताते हैं कि 1063 में, राजा उदयादित्य ने संस्कृत स्तोत्र के साथ चार पत्थर के शिलालेख स्थापित किए।


1195 में, राजा भरत सिंह चौहान ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और उसके पास एक महल का निर्माण किया।




ओमकारेश्वर मंदिर में 15 फीट ऊँचे 60 बड़े बड़े स्तम्भ हैं।


गर्भ गृह को रात को बंद कर दिया जाता है



ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ट्रस्ट का कार्यालय परिसर में ही स्थित है प्रथम और द्वितीय तलों के शिवलिंगों के प्रांगणों में नन्दी की मूर्तियां स्थापित हैं।



मंदिर के में भक्तों के लिए भोजनालय भी चलाया जाता है, जहाँ पर नाममात्र के शुल्क पर भोजन प्रसाद मिलता है।

मान्यता है कि ओंकारेश्वर दर्शन से पहले प्रथम दर्शन पंचमुखी श्रीगणेश करना चाहिए। पंचमुखी गणेश प्रतिमा ओंकारेश्वर मंदिर के दाहिनी ओर स्थित है। पंचमुखी गणेश के पांच मुखों के महत्व के बारे में पंचकोष अन्नमय, प्राणमय, विज्ञान कोष, आनंदमय कोश। पंचमुखी गणेश के पांचों रूप सृष्टि के प्रतीक हैं।



यह लिंग मन्दिर के ठीक शिखर के नीचे न होकर एक ओर हटकर है। लिंग के चारों ओर जल भरा रहता है। मन्दिर का द्वार छोटा है। ऐसा लगता है जैसे गुफा में जा रहे हों। पास में ही पार्वतीजी की मूर्ति है।



स्वयंभू ज्योतिर्लिंग के दर्शन



ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का परिसर एक पांच मंजिला भवन के रूप में है जिसकी पहली मंजिल पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है भवन की तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव स्थापित है, चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।




प्रथम तल पर महाकालेश्वर का मंदिर है


द्वितीय तल पर स्थित महाकालेश्वर लिंग के ऊपर छत समतल न होकर शंक्वाकार है





Mamleshwar temple------- मामलेश्वर मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं। इस मंदिर का वास्तविक नाम अमरेश्वर मंदिर है। यह एक संरक्षित स्मारक है जो प्राचीन भारत की असाधारण स्थापत्य शैली को प्रदर्शित करता है। ममलेश्वर मंदिर एक छोटे से क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें एक हॉल और एक गर्भगृह है।


 यह मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर के ठीक विपरीत नर्मदा नदी के किनारे स्थित है। शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की भी प्रतिमा यहां मौजूद है।



  इस मंदिर के आंगन में और छह मंदिर भी हैं|

इस मंदिर में शिव स्त्रोत्र एक शिलालेख के रूप में स्थित है यह 1863 AD से दिनांकित है|



मंदिर सुबह
5:30 से 9:00 बजे तक खुला रहता है। मंदिर बस स्टैंड से केवल 1.9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  






ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का सही नाम अमरेश्वर मंदिर है।




यहां श्रद्धाओं को ज्योतिर्लिंग को छूकर पूजा करने की इजाजत है।




मान्धाता टापू में ही ऑकारेश्वर की दो परिक्रमाएँ होती हैं - एक छोटी और एक बड़ी।




नर्मदा नदी के दक्षिण तट पर ब्रह्ममेश्वर महादेव और विष्णु मंदिर बना है। उत्तरी तट पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है तीनों मंदिरों की दूरी 700-700 फीट पर है । इन मंदिरों के बीच समान दूरी होने पर श्रीयंत्र आकृति बनती है। मध्य भाग में मां नर्मदा है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार श्रीयंत्र के पूजन से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती है।








Sunday, 29 May 2022

मुक्तेश्वर धाम पठानकोट-- article by -HOME STAY PATHANKOT

 










आज आपको उत्तर भारत के कुछ ऐसे  स्थानों से रूबरू कराने जा रहा है जहां पांडवों ने अपने बारह वर्ष के बनवास के दौरान  महाभारत के युद्ध से पहले समय व्यतीत किया था,,,

पांडवों से जुड़े कुछ प्रमुख स्थान है --हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मौजूद 15 शिखर मंदिरों वाली  संरचना मसरूर मंदिर,,, बाथू मंदिर- शिमला से करीब 110 किमी की दूरी पर पब्बर नदी के किनारे जुब्बल में मां हाटेश्वरी का प्राचीन मंदिर,,, मंडी जिला के जंजैहली गांव में पांडव शिला और भीम शिला,,, मंडी के करसोग में ममलेश्वर मंदिर

 चलिए आपको सबसे पहले लिए चलते हैं-पंजाब के जिला पठानकोट की प्रसीद पांडव गुफा मे-- गुफा मंदिर हिंदू देवता भगवान शिव को समर्पित हैं

पठानकोट के प्रसिद्ध मुक्तेश्वर शिवधाम को प्राचीन पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है। शिवालिक की पहाड़ियों में लगभग 5500 साल से भी पुराने इस धाम के बारे में कहा जाता है कि इसे पांडवों ने विकसित किया था। इस धाम को छोटा हरिद्वार भी कहा जाता है। जो हरिद्वार में लोग राख का विसर्जन नहीं कर सकते  उनके परिजन इसे मुक्तेश्वर महादेव मं दिर में रावी नदी में प्रवाहित करते हैं।

मुक्तेश्वर धाम पठानकोट  से 22 किलोमीटर गांव ढूंग में रावी नदी के किनारे स्थित है। किम्वदंति के अनुसार द्वापर युग में युद्धिष्ठिर बनवास काटने अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ लगभग 6 महीने यहां रहे थे। यहां गुफाओं में उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया था। इसमें संगमरमर का शिवलिंग और तांबे की योनि है।

काफी गहराई में पहाड़ियों के बीच नदी निर्मल धारा भी बहती दिखाई देती है। -

250 सीढ़ियां उतरने के बाद मंदिर परिसर में पहुंच जाएंगे, जहां  महाभारत काल की गवाह चार गुफाएं हैं। नीचे दो गुफाओं में से एक बड़ी गुफा में मंदिर, द्रौपदी की रसोई, परिवार मिलन कक्ष  है। बाकी तीन गुफाएं थोड़ा ऊंचाई पर हैं। इनमें से एक में अंगरक्षक सहायक तेली को रात में जगाते रहने के लिए कोहलू लगाया गया था। एक गुफा द्रौपदी के लिए आरक्षित थी और चौथी में दूध और भोजन भंडारण किया जाता था। यहां अमावस्या, नवरात्र, बैसाखी और शिवरात्रि पर मेला भी लगता है।

नाथ सम्प्रदाय (नादी जनेऊ)

 नाथ सम्प्रदाय (नादी जनेऊ)

https://youtu.be/kCaT2tOQVss 


नाथ, भारत में हिंदू धर्म के भीतर एक शैव उप-परंपरा है इसके संस्थापक गोरखनाथ माने जाते हैं 'नाथ' शब्द का अर्थ होता है स्वामी  मध्ययुगीन आंदोलन में इसने भारत में बौद्ध धर्म, शैववाद और योग परंपराओं के विचारों को जोड़ा-- नाथ भक्तों का एक संघ है, जो शिव को अपना पहला स्वामी मानते हैं, शिव को 'अलख' (अलक्ष) नाम से सम्बोधित करते हैं। यह हठयोग की साधना पद्धति पर आधारित पंथ है प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली बार व्यवस्था दी।  नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं  हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है।

 ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। बिना सिले वस्त्र धारण करते हैं

प्रारम्भिक दस नाथ -आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और श्रीकांथ नाथ। इनके बारह शिष्य थे - नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ, वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन

इसका मठ मुख्यालय गोरखपुर में है

गुहेश्वरी shaktipeeth -boudhnath stupa -nepal -kathmandu

SHAKTIPEETH KATHMANDU  यहां गिरा था माता सती का घुटना इस मंदिर को गुहेश्वरी और गुजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। अष्टमी...